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Sunday, July 31, 2011
अब के बारिश की बूंदों में नमी ज्यादा है,
या की धरती की प्यास में कोई कमी सी है?
कितने बेबस से बह रहे हैं बेकैफ़ दरिया,
बिना धड़कन रगों में ज़िन्दगी ज्यों बही सी है..
Friday, April 22, 2011
बूँद
छोडती हैं जो आसमान ,
मिट्टी में मिल जाने के लिए|
फिर बह दूर उस मिटटी से ही,
सागर में खो जाने के लिए|
बहती हैं भाव के झरने बन,
जब बैठूं कभी मैं पलकें मूँद |
शीतल, निर्मल, निज आभा लिए,
छोटी सी एक पानी की बूँद | :)
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